महाराणा प्रताप की पूरी जीवनी: मेवाड़ के शेर की गाथा | जन्म से बलिदान तक का प्रेरणादायक सफर

 

नमस्ते दोस्तों, JB Story Hindi में आपका स्वागत है! आज हम बात करेंगे भारत के सबसे वीर योद्धाओं में से एक महाराणा प्रताप की। महाराणा प्रताप, जिन्हें "मेवाड़ का शेर" कहा जाता है, 16वीं सदी के राजपूत राजा थे जिन्होंने मुगल सम्राट अकबर की विशाल सेना के सामने कभी घुटने नहीं टेके। उनका जीवन स्वाभिमान, देशभक्ति और संघर्ष की मिसाल है। हल्दीघाटी का युद्ध, घोड़ा चेतक की वीरता, जंगलों में कंद-मूल खाकर गुजारा – ये सब महाराणा प्रताप की कहानी के हिस्से हैं। इस पोस्ट में हम महाराणा प्रताप की पूरी जीवनी – जन्म से मृत्यु तक – विस्तार से जानेंगे। इतिहास, युद्ध, व्यक्तिगत जीवन, विरासत और रोचक तथ्यों सब कवर करेंगे। पोस्ट लंबी है, लेकिन पढ़ोगे तो गर्व महसूस होगा!

महाराणा प्रताप का जन्म और परिवार

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ किले में हुआ था। उनके पिता महाराणा उदय सिंह द्वितीय मेवाड़ के राजा थे, और माता राणी जीवत कंवर (जयवंता बाई)। सिद्धार्थ की तरह प्रताप का बचपन भी राजसी वैभव में बीता। वे उदय सिंह की सबसे बड़ी संतान थे, इसलिए उत्तराधिकारी माने जाते थे।

परिवार बड़ा था – उदय सिंह की कई रानियां थीं। प्रताप की शिक्षा-दीक्षा राजपूत परंपरा के अनुसार हुई – घुड़सवारी, तलवारबाजी, धनुषबाण, शास्त्र। बचपन से ही वे बहादुर और दयालु थे।

राज्यारोहण और मुगलों से संघर्ष की शुरुआत

1568 में उदय सिंह की मृत्यु के बाद महाराणा प्रताप मेवाड़ के सिंहासन पर बैठे। उस समय मुगल सम्राट अकबर भारत के बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुका था। अकबर ने राजपूत राजाओं को अपने अधीन करने की नीति अपनाई – कई राजा (जैसे मान सिंह, भगवान दास) उसके साथ हो गए। लेकिन प्रताप ने कभी अधीनता स्वीकार नहीं की।
अकबर ने कई बार दूत भेजे – मान सिंह, जलाल खान आदि – लेकिन प्रताप ने कहा "मेवाड़ का राजा कभी मुगल के सामने झुकेगा नहीं"। इससे युद्ध अपरिहार्य हो गया।

हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध (1576)

महाराणा प्रताप का सबसे प्रसिद्ध युद्ध हल्दीघाटी का युद्ध (18 जून 1576) है। अकबर की सेना (80,000 सैनिक, मान सिंह और आसफ खान के नेतृत्व में) के सामने प्रताप की सेना सिर्फ 20,000 थी। फिर भी प्रताप ने डटकर मुकाबला किया।

  • चेतक की वीरता: प्रताप का घोड़ा चेतक घायल होने पर भी उन्हें सुरक्षित ले गया, नाला पार किया और दम तोड़ दिया।

  • भील योद्धाओं का साथ: हकीम खान सूरी, भील सरदार और अन्य साथी।

  युद्ध अनिर्णीत रहा, लेकिन प्रताप कभी हारे नहीं – उन्होंने गुरिल्ला युद्ध अपनाया।

हल्दीघाटी प्रताप की बहादुरी का प्रतीक है।

जंगलों में संघर्ष और त्याग

युद्ध के बाद प्रताप जंगलों में चले गए। परिवार के साथ कंद-मूल, घास की रोटी खाकर गुजारा। एक कहानी प्रसिद्ध है – उनकी बेटी को भूख लगी, तो घास की रोटी खाई। प्रताप ने अकबर को पत्र लिखा "मेवाड़ का राजा घास की रोटी खा सकता है, लेकिन गुलामी नहीं"।

इस दौरान उन्होंने मुगलों पर गुरिल्ला हमले किए, कई क्षेत्र वापस जीते।

व्यक्तिगत जीवन और परिवार

प्रताप की 11 रानियां थीं, सबसे प्रसिद्ध रानी अजबदे पंवार। पुत्र अमर सिंह उत्तराधिकारी बने। प्रताप दयालु थे – प्रजा की रक्षा सबसे ऊपर।

अंतिम वर्ष और मृत्यु

1597 में शिकार के दौरान घायल होने से 19 जनवरी 1597 को चावंड में मृत्यु हुई। अंतिम शब्द "मेवाड़ की स्वतंत्रता बनी रहे"।

महाराणा प्रताप की विरासत

प्रताप स्वाभिमान के प्रतीक हैं। उनकी मूर्ति, चेतक स्मारक, हल्दीघाटी संग्रहालय। आज भी राजस्थान में गर्व से याद किए जाते हैं।

निष्कर्ष: 

 महाराणा प्रताप ने सिखाया कि स्वाभिमान से बड़ा कुछ नहीं। जय मेवाड़!

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