पृथ्वीराज चौहान की पूरी जीवनी: चौहान वंश के वीर सम्राट | जन्म से तराइन की लड़ाई और शहादत तक का ऐतिहासिक सफर
नमस्ते दोस्तों, JB Story Hindi में आपका स्वागत है! आज हम बात करेंगे मध्यकालीन भारत के सबसे प्रसिद्ध और बहादुर राजपूत राजाओं में से एक पृथ्वीराज चौहान (Prithviraj Chauhan) की। उन्हें राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता है। 12वीं शताब्दी में उन्होंने अजमेर और दिल्ली पर शासन किया और मुहम्मद गौरी जैसे आक्रमणकारी के खिलाफ अपनी वीरता से इतिहास रच दिया। उनकी कहानी में बहादुरी, प्रेम (संयोगिता के साथ), युद्ध और बलिदान सब कुछ है। पृथ्वीराज रासो महाकाव्य में उनकी गाथा अमर है, हालांकि इतिहासकारों में उनकी कई कहानियों पर बहस होती है कि कौन सी कवि की कल्पना है और कौन सी हकीकत। इस पोस्ट में हम उनकी पूरी जीवनी हिंदी में विस्तार से जानेंगे – जन्म, बचपन, राज्यारोहण, प्रमुख युद्ध, संयोगिता की प्रेम कहानी, तराइन की लड़ाइयाँ और अंतिम समय तक।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1166 ईस्वी (कुछ स्रोतों में 1168 या 1149 भी कहा जाता है) में हुआ था। वे चौहान वंश (चाहमान वंश) के राजा सोमेश्वर चौहान और रानी कर्पूरादेवी (कुछ स्रोतों में कमलादेवी) के पुत्र थे। उनका जन्म गुजरात के पाटन क्षेत्र में हुआ था, क्योंकि उनके पिता सोमेश्वर को चालुक्य दरबार में शरण मिली थी।
बचपन से ही पृथ्वीराज प्रतिभाशाली थे। उन्होंने संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश जैसी छह भाषाओं पर पकड़ बनाई। युद्ध कला में निपुण थे – तलवारबाजी, धनुषबाण, घुड़सवारी और शस्त्र विद्या में महारत हासिल की। पिता सोमेश्वर की मृत्यु 1177 ईस्वी में हुई, जब पृथ्वीराज मात्र 11 साल के थे। इसके बाद उन्होंने अपनी माँ के साथ अजमेर की गद्दी संभाली। 1180 ईस्वी में उन्होंने वास्तविक शासन संभाला।
उनकी राजधानी अजयमेरु (आधुनिक अजमेर) थी, लेकिन लोक कथाओं में उन्हें दिल्ली का राजा कहा जाता है। उनका राज्य सपादलक्ष क्षेत्र (आज का राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से) तक फैला था।
राज्यारोहण और प्रारंभिक विजय
पृथ्वीराज ने अपने राज्य का विस्तार किया। उन्होंने पड़ोसी राज्यों पर कई सफल अभियान चलाए:
• चंदेल राजा परमर्दिदेव को 1182 में हराया।
• गुजरात के भिमदेव और अन्य राजाओं को परास्त किया।
• उन्होंने दिल्ली को भी अपने प्रभाव में लाया और वहाँ अपनी शक्ति स्थापित की।
उनकी सेना में राजपूत, भील और अन्य योद्धा शामिल थे। वे एक कुशल योद्धा और प्रशासक थे।
संयोगिता के साथ प्रेम कहानी
पृथ्वीराज चौहान की सबसे प्रसिद्ध कहानी उनकी संयोगिता (सन्योगिता) से प्रेम कहानी है। संयोगिता कन्नौज के राजा जयचंद की बेटी थीं। जयचंद और पृथ्वीराज में पुरानी दुश्मनी थी। जयचंद ने संयोगिता का स्वयंवर रखा, लेकिन पृथ्वीराज को निमंत्रण नहीं दिया।
किंवदंती के अनुसार, संयोगिता ने पृथ्वीराज को पहले से ही पसंद किया था। स्वयंवर में पृथ्वीराज की मूर्ति दरवाजे पर लगाई गई थी (अपमान के लिए)। संयोगिता ने मूर्ति पर माला डालकर पृथ्वीराज को अपना पति चुन लिया। पृथ्वीराज ने छापामार हमला करके संयोगिता का हरण कर लिया और उनसे विवाह किया।
ये कहानी पृथ्वीराज रासो में विस्तार से है, लेकिन इतिहासकारों में इसकी प्रामाणिकता पर बहस है। कुछ इसे कवि चंदबरदाई की कल्पना मानते हैं।
तराइन की लड़ाइयाँ और मुहम्मद गौरी से संघर्ष
पृथ्वीराज का सबसे बड़ा संघर्ष मुहम्मद गौरी (शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी) से था। गौरी ने 1191 में तराइन का प्रथम युद्ध लड़ा, जिसमें पृथ्वीराज ने उसे बुरी तरह हराया। गौरी को छोड़ दिया गया।
लेकिन 1192 में तराइन का द्वितीय युद्ध हुआ। इस बार गौरी ने बड़ी सेना के साथ हमला किया। पृथ्वीराज की सेना थक गई और रणनीति में कमी के कारण हार गई। पृथ्वीराज को बंदी बनाया गया।
पृथ्वीराज रासो के अनुसार, बंदी होने पर पृथ्वीराज ने अंधे होने के बावजूद शब्द-भेदी बाण से गौरी को मार गिराया और चंदबरदाई ने भी खुद को मार डाला। लेकिन आधुनिक इतिहासकार इसे काव्य मानते हैं। वास्तव में, पृथ्वीराज को गौरी ने कैद कर लिया और बाद में मार डाला गया (1192 में)।
मृत्यु और विरासत
पृथ्वीराज की मृत्यु 1192 ईस्वी में हुई। उनकी उम्र मात्र 25-26 वर्ष थी। उनकी हार के बाद दिल्ली और उत्तरी भारत में मुस्लिम शासन मजबूत हुआ। लेकिन उनकी वीरता की गाथा आज भी जीवित है।
विरासत:
• पृथ्वीराज रासो – चंदबरदाई द्वारा लिखित महाकाव्य।
• राजस्थान में उनकी मूर्तियाँ, स्मारक और हल्दीघाटी का युद्ध स्थल।
• उन्हें "भारत का अंतिम हिंदू सम्राट" कहा जाता है।
• उनकी कहानी फिल्मों (सम्राट पृथ्वीराज), टीवी और लोककथाओं में अमर है।
रोचक तथ्य
• वे 6 भाषाओं के ज्ञाता थे।
• बचपन में ही युद्ध विद्या में माहिर थे।
• संयोगिता की कहानी भारत की सबसे प्रसिद्ध प्रेम कथाओं में से एक है।
• तराइन की पहली लड़ाई में उन्होंने गौरी को हराया, लेकिन दूसरी में हार गए।
निष्कर्ष:
पृथ्वीराज चौहान का जीवन बहादुरी, प्रेम और स्वाभिमान की मिसाल है। उन्होंने सिखाया कि हार मानने से बेहतर है लड़ते रहना। जय हिंद!
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